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शिमला के सांसद बागवानों की आवाज़ उठाने में असमर्थ, मोदी का 100–150% आयात शुल्क का वादा निकला जुमला: कौशल मुंगटा

शिमला

शिमला के सांसद बागवानों की आवाज़ उठाने में असमर्थ, मोदी का 100–150% आयात शुल्क का वादा निकला जुमला: कौशल मुंगटा

 

जिला परिषद सदस्य एवं अध्यक्ष बागवानी व कृषि समिति, जिला शिमला कौशल मुंगटा ने भारत–न्यूज़ीलैंड मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को हिमाचल प्रदेश के सेब बागवानों के लिए घातक बताते हुए कहा कि यह समझौता सिर्फ हिमाचल प्रदेश की लगभग ₹6000 करोड़ की सेब आधारित अर्थव्यवस्था को खत्म करने वाला है, जिससे राज्य के लाखों परिवार सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं और जिनकी रोज़ी-रोटी पर सीधा हमला हुआ है। कौशल मुंगटा ने बताया कि FTA के तहत भारत पहले वर्ष में 32,500 टन न्यूजीलैंड के सेब को मात्र 25 प्रतिशत कस्टम ड्यूटी पर आयात करने की अनुमति देगा, जो धीरे-धीरे बढ़ाकर छठे वर्ष तक 45,000 टन कर दी जाएगी। यह आयात 1 अप्रैल से 31 अगस्त के बीच होगा, जो भारतीय सेब के मुख्य सीजन से टकराता है और घरेलू बागवानों का बाज़ार छीन लेगा।उन्होंने कहा कि समझौते के तहत न्यूज़ीलैंड की 95 प्रतिशत वस्तुओं पर टैरिफ समाप्त या कम कर दिया गया है, जिसमें सेब पर आयात शुल्क 50 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत, नाशपाती पर 16.5 प्रतिशत और कीवी पर आयात शुल्क पूरी तरह समाप्त (0%) कर दिया गया है।कौशल मुंगटा ने नीति पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि सेब, कीवी और नाशपाती जैसे संवेदनशील उत्पादों के मामले में भारत ने टैरिफ-रेट कोटा (TRQ) और मौसमी पहुँच जैसी व्यवस्थाएँ अपनाईं, जो व्यवहार में बागवानों के लिए विनाशकारी हैं।

उन्होंने कहा कि जब भारत के डेयरी क्षेत्र को बचाने के लिए लगभग 30 प्रतिशत टैरिफ मदों (डेयरी, पशु उत्पाद, सब्जियाँ, बादाम, चीनी) को FTA से बाहर रखा गया, तो सेब बागवानों को मरने के लिए क्यों छोड़ दिया गया? उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उठ रही आपत्तियों का हवाला देते हुए कहा कि खुद न्यूजीलैंड के विदेश मंत्री विंस्टन पीटर्स ने इस भारत–न्यूज़ीलैंड FTA की कड़ी आलोचना करते हुए इसे न तो पूरी तरह स्वतंत्र और न ही निष्पक्ष बताया था। जब समझौते को लेकर दूसरे पक्ष के देश में भी सवाल उठ रहे हैं, तो फिर भारत में इसका सारा नुकसान सिर्फ सेब बागवानों को क्यों उठाना पड़ रहा है?” कौशल मुंगटा ने साफ शब्दों में कहा कि अगर भारत सरकार ने इस FTA में हर क्षेत्र में अपने फायदे का सौदा किया है, तो बलि का बकरा सिर्फ सेब बागवानों को ही क्यों बनाया गया? यह नीति नहीं, बल्कि हिमाचल के साथ अन्याय है।

उन्होंने आंकड़ों के ज़रिये सरकार के फैसले की गंभीरता समझाते हुए कहा कि न्यूज़ीलैंड में सेब की औसत पैदावार 53.6 टन प्रति हेक्टेयर है, जबकि भारत में यह मात्र 9.2 टन प्रति हेक्टेयर है। ऐसी असमान प्रतिस्पर्धा में हिमाचल का बागवान कैसे टिकेगा, यह सरकार को भी पता है। कौशल मुंगटा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा सवाल उठाते हुए कहा कि चुनावों में हिमाचल के बागवानों से यह वादा किया गया था कि सेब पर आयात शुल्क 100 से 150 प्रतिशत तक रखा जाएगा, लेकिन आज उसे घटाकर 25 प्रतिशत करना यह साबित करता है कि यह वादा भी एक जुमला बनकर रह गया है! उन्होंने शिमला के सांसद पर हमला करते हुए कहा कि “शिमला के सांसद बागवानों की इस ऐतिहासिक लड़ाई में पूरी तरह नाकारा और खामोश है।”

उन्होंने बागवानी के नाम पर राजनीति करने वालों पर भी निशाना साधते हुए कहा,बागवानी पर राजनीति करने वाले चेतन बरागटा और विधायक बलबीर वर्मा आज कहां सोए हुए हैं? कौशल मुंगटा ने चेतावनी दी कि अगर आज भी हम सब सोए रहे, तो हिमाचल की सेब इंडस्ट्री पूरी तरह खत्म हो जाएगी। उन्होंने प्रदेश के बागवानों से आह्वान किया कि अब हम सबको आगे आना होगा और संगठित होकर संघर्ष करना होगा।

उन्होंने याद दिलाया कि बागवानों की एकता के कारण ही हिमाचल सरकार ने यूनिवर्सल कार्टन व्यवस्था शुरू की, बंद पड़ी सब्सिडी बहाल की और समर्थन मूल्य बढ़ाया। जब हम एकजुट हुए थे, तब सरकार को मानना पड़ा—आज फिर अगर हम साथ खड़े होंगे, तो दिल्ली को भी मानना पड़ेगा।”अंत में कौशल मुंगटा ने दो टूक शब्दों में कहा— मैं इस मुद्दे पर किसी भी कीमत पर चुप नहीं बैठूंगा। इसमें न सरकार देखी जाएगी, न पार्टी। यह लड़ाई हिमाचल के सेब बागवानों के अस्तित्व की है।

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